Tuesday, November 8, 2011

क्या इस रात की कोई सुबह नहीं होगी


कब तक छले जाएंगें हम भारत के लोग
क्या इस रात की कोई सुबह नहीं होगी

-प्रो. बृजकिशोर कुठियाला



भारत की आम जनता आज सकते में है,वैचारिक और व्यावहारिक दोनों ही स्तरों पर कि कर्तव्यविमूढ़ स्थिति में है। आध्यात्मिक योग गुरू रामदेव व सिद्ध समाजसेवी अन्ना हजारे का राजनीति के लिए सुधारवादी अभियानों से जो प्रकाश की किरणें दिखने लगी थीं, वे अब आम आदमी को भ्रम की अनुभूति देने लगी हैं। मानो रात में घने बादलों के घोर अन्धरे में बिजली कड़की, क्षणिक प्रकाश हुआ, आशा बंधी और फिर से सब अंधकारमय।

रामदेव का आंदोलन जिस प्रकार क्रांति पकड़ता दिखा उससे लगा कि वर्षों से चले आ रहे कदाचार में कुछ कमी आएगी। आम आदमी इतनी तो समझ रखता है कि सरकार और उसका तन्त्र उचित अनुचित में भेद किए बिना किसी भी प्रकार रामदेव जैसे आन्दोलनों को कमजोर करने में कसर नहीं छोडेंगे। ऐसा हुआ भी। रात के अंधेरे में पुलिस की कार्यवाही हुई। परन्तु जिस प्रकार बाबा वहां से निकले, उसकी कल्पना आमजन को नहीं थी। आम भारतीय तो अपने नेतृत्व से वीरता, साहस व विवेक की अपेक्षा करता है। महिलाओं के कपड़े पहनकर कर्मस्थली से पलायन तो कुशल नेतृत्व के व्यवहार से विपरीत लगता है। साधारण भारतीय ने तो भगतसिंह, सुभाष और गांधी जैसे अनेक महापुरूषों के पौरूष व त्याग को श्रद्धा प्रकट की है। पलायन को तो उसने कभी नहीं स्वीकारा। बाबा के आन्दोलन का पहला दृश्य भारतीय जनता के लिए दुखान्त रहा और उसकी आशा के टूटने की आवाज तो हुई पर किसी ने सुनी नहीं।

परन्तु एक दूसरे बाबा अन्ना हजारे तुरन्त ही राजनीति के आकाश में उभरे और ऐसा लगा कि आखिरकार तो भ्रष्टाचार व अव्यवस्था की रात की सुबह होगी ही। अन्ना ने तो दुर्लभ साहस व विवेक का भी परिचय दिया। जेल भी गए, अनशन भी किया, डरे भी नहीं और अपनी बात पर स्थिर रहे। संसद को भी मजबूर कर दिया। मांग पूरी होने के आश्वासन को सफलता मानकर पूरा देश खुशी से झूमा भी और उम्मीदों के पकवान की हंडी मानों चूल्हे पर चढ़ गई हो।

अन्ना व उसके सहयोगियों पर आक्षेप लगेंगे, आक्रमण होंगे और उनकी छवि पर दाग लगाने का भी प्रयास होगा - यह सब देश की जनता जानती थी। परन्तु विश्वास था कि अन्ना व उसकी टीम के सदस्य इस अग्नि परीक्षा में सफल होंगे। धीरे-धीरे यह विश्वास भी टूटा, फिर से आशाओं के दर्पण में दरार आई, टूटती मौन ध्वनि को फिर किसी ने नहीं सुना।

आर्थिक शुचिता के स्तर पर अन्ना व उसकी टीम के दो सदस्य अनुतीर्ण हुए। कितना भी तर्क किया जाए भ्रष्टाचार विरोधी नेतृत्व में व्यावहारिक व आर्थिक ईमानदारी तो शक के दायरे में भी नहीं आनी चाहिए। ऐसी स्थितियों में भूल न होने पर भी भूल लगने जैसी बात हो तो उसके लिए क्षमा मांगना व प्रायश्चित करने से मान-सम्मान बढ़ता है। यहां तो विपरीत ही हो रहा है। हमने जो गलत किया वह तो तार्किक और क्षम्य है, परन्तु दूसरों ने जो किया या नहीं किया उसके लिए सजा मिलनी ही चाहिए। इस समय इस प्रश्न का उत्तर तलाशना चाहिए कि यदि अन्ना द्वारा प्रस्तावित लोकपाल बिल लागू होता तो इनके बारे में क्या निर्णय होते। आम भारतीय के मन में यह उतना ही बड़ा अपराध है जितना राजा का या कलमाड़ी का।

टीम के एक अन्य सदस्य ने तो देश की अखंडता पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया। जनभावना ऐसी है कि चीन व पाकिस्तान द्वारा अधीकृत भारत देश की भूमि को वापस लेना चाहिए, परन्तु इन महोदय ने तो देश के एक हिस्से को भारत से अलग करने का ही सुझाव दे दिया। यदि उनके सुझाव के मानना प्रारम्भ कर दें तो शायद आदरणीय प्रधानमंत्री केवल दिल्ली प्रान्त के ही प्रधानमंत्री रह जाएंगे और आसपास खालिस्तान, दलितस्थान, मुगलिस्थान, द्वविड़स्थान आदि ऐसे कई देश विदेश बन जाएंगे। टीम अन्ना के सक्रिय सदस्य होने के नाते ऐसे विचारों के व्यक्तित्व को ऐसी टीम में होना जो देश में क्रांति लाने का संकल्प किए हुए हैं, कुछ नहीं बहुत अटपटा लगता है।

तीन और घटनाक्रमों की चर्चा भी प्रासंगिक लगती है। देश में अनेकों छोटे बड़े अभियान भ्रष्टाचार विरोध में और व्यवस्थाओं के सुधार के पक्ष में प्रारम्भ हुए हैं। सभी राजनीतिक दल भी पहले से अधिक सचेत हुए हैं। देश के सबसे बड़े छात्रों के संगठन ने ‘एक्शन अगेंस्ट करप्शन’ का अभियान भी चलाया है। अनेक सामाजिक संस्थाओं ने भी कार्यक्रम घोषित किये है। पूरे सामाजिक और राजनीतिक संवाद में भ्रष्टाचार मुख्य मुद्दा बना है। देखने वाली बात यह है कि आम समाज इनसे कितना जुड़ पाता है और समस्याओं के समाधान की क्या कल्पना यह सब प्रस्तुत करते हैं।

दूसरा रामदेव व अन्ना टीम की फिर से सक्रियता प्रारम्भ हुई है। रामदेव तो प्रवास पर निकले हैं और योग गुरू के चोले के साथ-साथ अपने को सुधारवादी सक्रिय सन्त के रूप में स्थापित करने के प्रयास में है। जनता का जोश कुछ कम है परन्तु यदि जनमानस को कार्य सिद्ध करने की इच्छाशक्ति और प्रभावी उपायों का आभास हुआ तो हताश जनता एक बार फिर जुड़ सकती है। टीम अन्ना तो किसी भी छोटे राजनीतिक संगठन की तरह व्यवहार कर रही है। अपने झूठ को ही झुठलाने में लगी है। लगता है कि अस्तित्व की ही लड़ाई लड़ रही है। अन्ना का मौन आत्मशुद्धि है या प्रायश्चित। या तपस्या। या पलायन। जनता नहीं जानती, जब तब वे कुछ कहते या करते नहीं।

तीसरी महत्वपूर्ण प्रक्रिया राजनीति में आत्म विवेचना की है। सभी रंगों के राजनैतिक दलों में दिखने और बोलने वालों के साथ-साथ अदृश्य व मौन परन्तु सक्रिय दुष्टों की कमी नहीं है। परन्तु सज्जन राजनीतिज्ञों की संख्या भी नगण्य नहीं है। पिछले पांच छः महीनों में इस सज्जन शक्ति ने अपने अन्दर झांकना प्रारम्भ किया है और अपने से ही प्रश्न किया है आखिर कब तक ? देश व समाज के प्रति कर्तव्यबोध उनसे प्रश्न करता है कि कौन बड़ा - देश या पार्टी। यह प्रक्रिया अभी व्यक्तिगत स्तर पर है, कुछ-कुछ प्रयास सामूहिकता से चिन्तन करने का ही रहा है। आशा करनी चाहिए कि पूरे देश की राजनीतिक व्यवस्था में जो सज्जन शक्ति है, पार्टी व विचारधारा से उपर उठकर संगठित होगी और आम जनता में जो आशा का दीपक बुझ गया है उसे फिर से जलाएगी। ऐसा नहीं हुआ तो आम आदमी का संयम का बोध टूटना अनिवार्य है। त्वरित उफान से जब जनमानस उठता है तो परिवर्तन की आंधी को साथ लाता है पर वह आंधी रक्तिम भी हो सकती है इस संभावना को नकारा नहीं जा सकता। जनता जनार्दन को कुछ लोग कुछ समय के लिये धोखा दे सकते हैं परन्तु यदि हर ओर से और हर विषय में धोखा मिलेगा तो विपरीत प्रतिक्रिया होना स्वभाविक है।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति हैं)

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