Monday, July 31, 2017

पुस्तक समीक्षा - मोदी राजनीति का दस्तावेज 'मोदी युग'

पुस्तक समीक्षा 

मोदी राजनीति का दस्तावेज 'मोदी युग'

लोकेन्द्र सिंह



यह मानने में किसी को कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि हमारे समय में भारतीय राजनीति के केंद्र बिन्दु नरेन्द्र मोदी हैं। राजनीतिक विमर्श उनसे शुरू होकर उन पर ही खत्म हो रहा है। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस से लेकर बाकि राजनीतिक दलों की राजनीतिक रणनीति में नरेन्द्र मोदी प्राथमिक तत्व हैं। विधानसभा के चुनाव हों या फिर नगरीय निकायों के चुनाव,भाजपा मोदी नाम का दोहन करने की योजना बनाती हैजबकि दूसरी पार्टियां मोदी की काट तलाशती हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के समर्थक जहाँ प्रत्येक सफलता को नरेन्द्र मोदी के प्रभाव और योजना से जोड़कर देखते हैंवहीं मोदी आलोचक (विरोधी) प्रत्येक नकारात्मक घटना के पीछे मोदी को प्रमुख कारक मानते हैं। इसलिए जब राजनीतिक विश्लेषक संजय द्विवेदी भारतीय राजनीति के वर्तमान समय को 'मोदी युग' लिख रहे हैंतब वह कोई अतिशयोक्ति नहीं है। अपनी नई पुस्तक 'मोदी युग : संसदीय लोकतंत्र का नया अध्याय' में उन्होंने वर्तमान समय को उचित ही संज्ञा दी है। ध्यान कीजिए,संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) और कांग्रेसनीत केंद्र सरकार को कब और कितना 'मनमोहन सरकार' कहा जाता थाउसे तो संप्रग के अंग्रेजी नाम 'यूनाइटेड प्रोगेसिव अलाइंसके संक्षिप्त नाम 'यूपीए सरकारसे ही जाना जाता था। इसलिए जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) और भाजपानीत सरकार को 'मोदी सरकार' कहा जा रहा हैतब कहाँ संदेह रह जाता है कि भारतीय राजनीति यह वक्त 'मोदीमय' है। हमें यह भी निसंकोच स्वीकार कर लेना चाहिए कि आने वाला समय नेहरू,इंदिरा और अटल युग की तरह मोदी युग को याद करेगा। यह समय भारतीय राजनीति की किताब के पन्नों पर हमेशा के लिए दर्ज हो रहा है। भारतीय राजनीति में इस समय को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। इसलिए 'मोदीयुगपर आई राजनीतिक चिंतक संजय द्विवेदी की किताब महत्वपूर्ण है और उसका अध्ययन किया जाना चाहिए।

            लेखक संजय द्विवेदी की पुस्तक 'मोदी सरकारके तीन साल के कार्यकाल का मूल्यांकन करती है। श्री द्विवेदी के पास राजनीतिक विश्लेषण का समृद्ध अनुभव है। पत्रकारिता में भी शीर्ष पदों पर रहकर उन्होंने राजनीति को बरसों बहुत करीब से देखा है। मोदी सरकार के सत्ता में आने के पहले से नरेन्द्र मोदी की राजनीति पर लेखक की पैनी नजर रही है। नरेन्द्र मोदी की राजनीति पर केंद्रित उनकी एक पुस्तक वर्ष 2014 में आई थी- 'मोदीलाइव'। यह पुस्तक 2014 के अभूतपूर्व चुनाव का अहम दस्तावेज थी। जबकि 'मोदी युगमोदी सरकार के तीन साल के कार्यकाल और इन तीन साल में मोदी राजनीति का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। मोदीयुग नाम से ऐसा नहीं समझा जाना चाहिए कि यह पुस्तक मोदी सरकार का गुणगान करती है। ऐसा भ्रम होना स्वाभाविक हैक्योंकि इस समय मोदी की खुशामद में अनेक पुस्तकें आ रही हैं। प्रधानमंत्री मोदी हमारे समय का ऐसा राजनीतिक व्यक्तित्व हैं कि उन पर अनेक लोग अपने-अपने अंदाज से लिख रहे हैं। मोदीयुग में मोदी की जय-जयकार होगीकुछ लोगों को ऐसा भ्रम इसलिए भी हो सकता है क्योंकि लेखक संजय द्विवेदी की पहचान'राष्ट्रीय विचारधारा के लेखक' के नाते भी है। किन्तुमोदी राजनीति पर केंद्रित अपने आलेखों में लेखक ने अपने लेखकीय धर्म को बहुत जिम्मेदारी से निभाया है। उन्होंने मोदी सरकार की लोककल्याणकारी नीतियों का समर्थन भी किया हैतो अनेक स्थानों पर सवाल भी खड़े किए हैं। एक अच्छे लेखक की यही पहचान है कि जब वह राजनीति का ईमानदारी से विश्लेषण करता हैतब अपने वैचारिक आग्रह को एक तरफ रखकर चलता है। वैसे भी राष्ट्रवादी विचारकों के लिए अपने वैचारिक लक्ष्य की पूर्ति के लिए राजनीति साधन नहीं हैजिस प्रकार कम्युनिस्टों के लिए राजनीति ही उनके वैचारिक लक्ष्यपूर्ति का साधन है। यहाँ वैचारिक धरातल पर खड़े रहकर राजनीति का निष्पक्ष मूल्यांकन संभव है। आवरण के बाद दो पृष्ठ पलटने के बाद ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले का चित्र देखकर भी यह भ्रम हो सकता है कि इस पुस्तक में भाजपा और मोदी की आलोचना संभव ही नहीं है। लेखक ने यह पुस्तक अपने मार्गदर्शक श्री होसबाले को समर्पित की है।  क्योंकिकिसी भी सामान्य व्यक्ति के लिए यह समझना मुश्किल है कि 'राष्ट्र सबसे पहलेकी अवधारणा में भरोसा करने वाले व्यक्ति के लिए राजनीति अलग विषय है और विचार अलग।
            मोदीयुग के पहले ही लेख में लेखक श्री द्विवेदी लिख देते हैं कि कैसे यह वक्त 'भारतीय राजनीति का मोदी समय'है। वह लिखते हैं- 'राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के लिए यह समय वास्तव में स्वर्णयुग हैजबकि पूर्वांचल के असम में सरकार बनाकर उसने कीर्तिमान रच दिया। हरियाणा भी इसकी एक मिसाल हैजहाँ पहली बार भाजपा की अकेले दम पर सरकार बनी है। मणिपुर जैसे राज्य में उसके विधायक चुने गए हैं। ऐसे कठिन राज्यों में जीत रही भाजपा अपने भौगोलिक विस्तार के रोज नए क्षितिज छू रही है। भाजपा और संघ परिवार को ये अवसर यूँ ही नहीं मिले हैं... नरेन्द्र मोदी दरअसल इस विजय के असली नायक और योद्धा हैंउन्होंने मैदान पर उतर कर एक सेनापति की भाँति न सिर्फ नेतृत्व दिया बल्कि अपने बिखरे परिवार को एकजुट कर मैदान में झोंक दिया।लेखक का स्पष्ट कहना है कि भाजपा के विस्तार और लगातार विजयी अभियान के पीछे नरेन्द्र मोदी की नीति और मेहनत का निवेश है।
            जैसा कि ऊपर लिखा गया है कि पुस्तक में मोदी सरकार का प्रशस्ति गान नहीं है। लेखन ने जहाँ जरूरी समझावहाँ नागफनी से चुभते सवाल खड़े किए हैं। नोटबंदी को उन्होंने 'कालेधन के खिलाफ आभासी' लड़ाई लिखा है। नोटबंदी के आगे सरकार के कैशलेस के विचार को खारिज करते हुए लेखक श्री द्विवेदी ने इस व्यवस्था को 'भारतीय मन और प्रकृति के खिलाफबताया है। कैशलेस को उन्होंने नोटबंदी से उपजा शिगूफा भी कहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संबंध में अकसर यह कहा जाता है कि वह अभी तक चुनावी मोड से बाहर नहीं निकल सके हैं। जहाँ तक मेरी समझ हैइसका एक बड़ा कारण उनकी भाषण शैली है। बाकि यह भी सच है कि वह अब भी विपक्ष पर उसी तरह हमलावर हैंजैसे कि सत्ता में आने से पहले थे। यहाँ लेखक प्रधानमंत्री मोदी से अपेक्षा व्यक्त करते हैं कि उन्हें शक्ति को सृजन में लगाना चाहिए। विपक्ष पर हल्लाबोल की मुद्रा से बाहर आना चाहिए। उनका कहना सही है- 'रची जा रही कृत्रिम लड़ाइयों में उलझकर भाजपा अपने कुछ समर्थकों को तो खुश रखने में कामयाब होगीकिंतु इतिहास बदलने और कुछ नया रचने की अपनी भूमिका से चूक जाएगी।लेखक संजय द्विवेदी ने यह भी लिखा है कि मोदी सरकार को अत्यधिक डिजिटलाइजेशन से बचना चाहिए। बौद्धिक और राष्ट्रप्रेमी समाज बनाने की चुनौती पर काम करना चाहिए। इसके लिए निष्पक्ष और स्वतंत्र बुद्धिजीवियों से सरकार को संपर्क करना चाहिए। अपने एक लेख में उन्होंने 'एफडीआईपर भाजपा सरकार की नीति पर भी चुभते हुए सवाल उठाए हैं।
            मोदीयुग में लेखक संजय द्विवेदी एक ओर मोदी सरकार की नीतियों और व्यवहार की आलोचना करते हैंतो वहीं उसे सचेत भी करते हैं। इसके साथ ही लेखक उन लोगों और संस्थाओं को भी उजागर करते हैंजो दुर्भावनापूर्ण ढंग से मोदी सरकार को बदनाम करने का षड्यंत्र रचती हैं। खासकरमोदी सरकार को एक समुदाय का दुश्मन सिद्ध करने के लिए देश में'असहिष्णुता' का बनावटी वातावरण बनाने वाली बेईमान बौद्धिकता पर लेखक ने खुलकर चोट की है। इस असहिष्णु समय मेंलिखिए जोर से लिखिए किसने रोका है भाईआभासी सांप्रदायिकता के खतरेकौन हैं जो मोदी को विफल करना चाहते हैं और कुछ ज्यादा हड़बड़ी में हैं मोदी के आलोचक सहित दूसरे अन्य लेखों में भी आप पढ़ पाएंगे कि कैसे कुछ ताकतें भ्रम उत्पन्न करके एक पूर्ण बहुमत की सरकार को बेकार के प्रश्नों में उलझाने की साजिश कर रही हैं। बहरहालपिछले तीन साल में भारत में एक अलग प्रकार की राजनीतिक हलचल देखने को मिली है। एक ओर भारतीय जनता पार्टी 'सबका साथ-सबका विकास' का दावा और वायदा करती हुई अपना विस्तार करती जा रही हैवहीं दूसरी ओर अपनी राजनीतिक जमीन को बचाने के संकट से जूझ रहे कुछेक राजनीतिक दल और विचारधाराएं सुनियोजित तरीके से ऐसे मुद्दों एवं घटनाओं को चर्चा के केंद्र में बनाकर रखे हुए हैंजिनसे आम समाज का कोई भला नहीं होना है। हालाँकि यह भी सच है कि इन प्रयासों से उनका राजनीतिक एजेंडा भी पूरा होता नहीं दिखता है। इस समय की राजनीति को जानना और समझना बेहद जरूरी है। 'मोदीयुग'पुस्तक इस काम में हमारी भरपूर मदद कर सकती है। महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की टिप्पणियों को पढ़कर भी इस पुस्तक की गहराई को समझा जा सकता है। प्रख्यात लेखक विजय बहादुर सिंहनवोदय टाइम्स के संपादक अकु श्रीवास्तवलोकसभा टीवी के संपादक आशीष जोशीख्यातिनाम कथाकार इंदिरा दांगीलेखिका एवं मीडिया शिक्षक डॉ. वर्तिका नंदाईटीवी उर्दू के वरिष्ठ संपादक तहसीन मुनव्वर और सुविख्यात एंकर सईद अंसारी ने भी पुस्तक के संबंध में अपने विचार व्यक्त किए हैं। छत्तीसगढ़ के लोकप्रिय मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने लेखक संजय द्विवेदी की लेखनी की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। पुस्तक की प्रस्तावना मूल्यानुगत मीडिया के संपादक और वरिष्ठ मीडिया अध्यापक प्रोफेसर कमल दीक्षित ने लिखी है और प्रख्यात लेखक डॉ. सुशील त्रिवेदी ने भूमिका लिखी है। पुस्तक में 63 लेख शामिल किए गए हैं। यह पुस्तक का पहला संस्करण हैजो हिंदी पत्रकारिता दिवस 30 मई2017 के सुअवसर पर आया है।
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पुस्तक : मोदीयुग : संसदीय लोकतंत्र का नया अध्याय
लेखक : संजय द्विवेदी
मूल्य : 200 रुपये
प्रकाशक : पहले पहल प्रकाशन25 एप्रेस कॉम्प्लेक्सएमपी नगरभोपाल (मध्यप्रदेश) - 462011
वितरक : मीडिया विमर्श428-रोहित नगरफेज-1भोपाल (मध्यप्रदेश)- 462039

Monday, June 26, 2017

केवल व्यक्ति नहीं, संगठनात्मक शक्ति का नाम है – मधु धवन (अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि)



केवल व्यक्ति नहीं, संगठनात्मक शक्ति का नाम है – मधु धवन
(अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि)

मधु धवन

आज प्रातः 4 बजे अग्रज बशीर जी से वाट्सैप संदेश में मधु धवन का फोटो मिला, थोड़ी देर बाद उनका फोन कॉल था, इस बात की पुष्टि के लिए कि मधु धवन न रही, क्या यह बात सच है ।  मित्रों को कॉल करने पर उन्हें कोई सूचना नहीं मिली थी, अतः बशीर जी मुझसे इसकी पुष्टि चाहते थे ।  मैंने तुरंत दो-चार नाम सुझाया, जिनसे पता कर मुझे भी सूचित करने के लिए ।  थोड़ी ही देर बाद बशीर जी ने पुनः कॉल करने इसकी पुष्टि की ।  इसके बावजूद मैं मानने के लिए तैयार नहीं था ।  लगातार कुछ मित्रों एस.एम.एस., फोन कॉल आने से मुझे उनकी बातों पर यकीन करना पड़ा ।  मधु धवन नहीं रही, इस बात को मैं अभी हजम नहीं कर पा रहा हूँ ।  उनका लेखना जितना विराट है, व्यक्तित्व उतना ही आत्मीय ।

सचमुच केवल व्यक्ति नहीं, संगठनात्मक शक्ति का नाम है – मधु धवन ।  आत्मीयता की प्रतिमूर्ति मधु धवन जी के साथ मेरा परिचय का दायरा लगभग तीन दशकों का है ।  लेखक, हिंदी प्रेमिका के रूप में उनकी गतिविधियों से लाखों लोग सुपरिचित हैं । 
तमिलनाडु में हिंदी लेखन के संबंध में लिखते हुए मैंने उनके कृतित्व के संबंध में भी लिखा था ।  2007-08 में जब अल्ताफ़ हुसैन जी ने मुझे चेन्नई में व्य़ाख्यान के लिए आमंत्रित किया, मेरे आगमन की सूचना पाकर चेन्नई के वरिष्ठ लेखक जो पधारे थे, उनमें मधु धवन जी भी थी ।  मेरा वक्तव्य कंप्यूटर-इंटरनेट के विकास के युग में लेखकों की भूमिका पर केंद्रित था ।  मेरे वक्तव्य के बाद कई लेखकों ने कहा कि हम अब कंप्यूटर-इंटरनेट से जुड़ जाएंगे ।  उनमें मधु धवन जी भी एक थी ।  उन्होंने मुझे कंप्यूटर पर कार्य करना सिखाना अनुरोध किया, दो-चार बार सिखाते ही वे स्वयं कंप्यूटर पर ई-मेल भेजने लगी । एक दूसरे संदर्भ में उन्होंने अपने लिए एक ब्लॉग तैयार करने का अग्रह किया और आश्वसन दिया कि उसे लगातार वे अपडेट करती रहेंगी, उन्होंने ब्लॉग नाम सुझाया तपस्या ।  मैंने उसी दिन (21 मई, 2013 को ही)  www.tapashya.blogspot.com  उनके लिए ब्लॉग सृजित कर उनकी कहानी बैखौफ का उसमें प्रकाशित कर दिया था ।  शायद व्यस्ततावश वे ब्लॉग को अपडेट नहीं कर पायीं ।  पांडिच्चेरी विश्वविद्यालय में मेरे आगमन के बाद उन्होंने आग्रह किया कि तमिल नाडु हिंदी साहित्य अकादमी की ओर एक कार्यक्रम का आयोजन करें ।  तदनुसार 2-3 दिसंबर, 2011 को पांडिच्चेरी विश्ववविद्याल एक राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया, जिसमें देश के विभिन्न प्रांतों के 150 से अधिक विद्वान शामिल हो गए थे । (http://yugmanas.blogspot.in/2011/12/blog-post.html )
            मधु धवन जी की आत्मीयता के असंख्य संस्मरण मेरे दिलों, दिमागों में सुरक्षित हैं ।  वे पांडिच्चेरी आने पर मेरे आवास पर अवश्य आ जाती थी, रास्त में कही जाते समय भी वे जरूर मुझसे मिलकर ही जाती थी ।  उनकी संगठनात्मक शक्ति का परिणाम है – तमिल नाडु हिंदी साहित्य अकादमी ।  अकादमी की पत्रिका बुलिटेन को लेकर भी वे हमेशा व्यस्त रहती थी ।  जनवरी 10 के एकाध आयोजनों में ही मैं जा पाया था ।  लगातार हर वर्ष कार्य करते हुए हज़ारों हिंदी प्रेमियों को एक मंच पर लाने की कोशिश उन्होंने की है ।  विगत दिनों में जब उन्होंने मुझे कॉल किया और इच्छा जतायी कि बहुभाषी लेखिका संघ की ओर से पांडिच्चेरी में हिंदी शिक्षण की गतिविधियाँ चलाना चाहते हैं और उसमें राधिका भी अपनी भूमिका निभा सकती हैं ।  मैंने फोन राधिका के हाथ में पकड़ा दिया था कि वे दोनों आपस सीधी बातचीत कर लें ।  इसके बाद उनका कॉल मेरे आलेख को लेकर था, जो तेलुगु साहित्य में राष्ट्रीयता की भावना पर था । भवानी गंगाधर जी के प्रेस में बैठकर उन्होंने मुझे कॉल किया था ।  सदा हिंदी भाषा एवं साहित्य की सेवा में वे सक्रिय रही हैं । 
       वे भौतिक रूप से इस संसार से दूर होने पर भी असंख्य आत्मीय मित्रों के दिलों में उनकी आत्मीय स्मृतियाँ सुरक्षित व अमर रहेंगी । उनकी शताधिक कृतियों के माध्यम से, विचारों के माध्यम से पाठकों के बीच भी वे अमर रहेंगी ।
       युग मानस के साथ भी वे सक्रिय जुड़ी रहीं ।

       उनके असामयिक निधन पर शोक के इन क्षणों में उनके स्वर्गस्थ आत्म की चिर शांति के लिए अश्रु नयनों से प्रार्थना से बढ़कर अधिक संस्मरण कह पाने में मैं अपने को असमर्थ महसूस कर रहा हूँ । 
            उनका पार्थिव शरीर उनके मित्रों, आत्मीयजनों के दर्शनार्थ चेन्नई स्थित उनका आवास के-3, अन्ना नगर पूर्व में रखा गया है ।  आज दुपहर 3 बजे के बाद उनकी अंत्योष्टि होगी ।
       अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि सहित...
-    डॉ. सी. जय शंकर बाबु